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School Bullying Report: स्कूलों में बुलिंग की समस्या कितनी गंभीर? 42% छात्रों की रिपोर्ट ने बढ़ाई चिंता


School Bullying Report: स्कूलों में बच्चों के बीच होने वाले गुंडागर्दी और बुलिंग की समस्या आज के समय में कितनी गंभीर रूप ले चुकी है, इसका अंदाजा हाल ही में सामने आए एक चौंकाने वाले आंकड़े से लगाया जा सकता है. एक रिसर्च के अनुसार भारत में करीब 42 प्रतिशत स्कूली छात्र बुलिंग और उत्पीड़न का शिकार हो रहे हैं. इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए अभी डेनमार्क के एक अनोखे मॉडल की देशभर में चर्चा शुरू हो गई है, जहां स्कूलों में बच्चों को सहानुभूति और कॉन्फ्लिक्ट रिजॉल्यूशन के पाठ पढ़ाए जाएंगे. 

रिसर्च में क्या आया सामने?

द टीचर फाउंडेशन और विप्रो अप्लाइंग थॉट इन स्कूल्स की ओर से 15 शहरों में किए गए एक रिसर्च के अनुसार देश के स्कूलों में बुलिंग के हालात काफी चिंताजनक है. कक्षा चार से आठ तक के 42 प्रतिशत छात्रों ने स्कूल परिसरों में बुलिंग और उत्पीड़न का सामना करने की बात कही है. वही कक्षा 9 से 12 तक के 36 प्रतिशत विद्यार्थियों ने भी इस तरह की परेशानियों की रिपोर्ट दी है. हालांकि यूनिसेफ इंडिया ने यह भी नोट किया है कि देश में बुलिंग को लेकर व्यापक राष्ट्रीय आंकड़ों की अभी भी कमी है. इसके अलावा भारत के पास पहले से कई एंटी बुलिंग नीतियों और स्कूल सुरक्षा उपाय मौजूद है, लेकिन असली चुनौती यह सुनिश्चित करने की है कि बच्चे बिना डरे सुरक्षित रूप से इसकी शिकायत कैसे करें और स्कूल प्रशासन इस पर लगातार व निष्पक्ष कार्रवाई कर सके. 

क्या है डेनमार्क का अनूठा मॉडल?

डेनमार्क स्कूलों में बच्चों के बीच तनाव को दूर करने और आपसी संबंधों को मजबूत करने के लिए खास प्रणाली बनाई जाती है. जिसे क्लास आवर कहा जाता है. इस साप्ताहिक सत्र के तहत बच्चों को हर हफ्ते एक घंटा ऐसा दिया जाता है, जिसमें वह अपने व्यक्तिगत और कक्षा से जुड़ी समस्याओं पर खुलकर चर्चा करते हैं. बच्चे एक दूसरे की बात सुनते हैं और मिल बैठकर आपसी झगड़े में तनाव को सुलझाने का प्रयास करते हैं. इस व्यवस्था का उद्देश्य हर छोटी सहमति को केवल डिसीप्लिनरी प्रॉब्लम के रूप में देखने के बजाय बच्चों को संवाद के जरिए जोड़ना है. 

ये भी पढ़ें-School Bullying Signs: स्कूलों में बुलिंग और साइबर बुलिंग कैसे पहचानें, किन सिग्नल से मदद मांगते हैं बच्चे?

क्या भारत में लागू हो सकता है ऐसा मॉडल?

एजुकेशन एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर भारत इस तरह के मॉडल को अपनाना चाहे, तो स्कूलों में एक अनिवार्य और उम्र के हिसाब से साप्ताहिक सत्र शुरू किया जा सकता है. इसमें दोस्ती, मिलजुल कर रहने और चीजों को शेयर करने पर चर्चा हो सकती है. इसके अलावा पीयर प्रेशर, भेदभाव, ऑनलाइन उत्पीड़न और विवाद हो जाने के तरीके पर बात की जा सकती है. हालांकि इसके लिए शिक्षकों को भी विशेष ट्रेनिंग देनी होगी, ताकि वह बच्चों के बीच बातचीत का सही मार्गदर्शन कर सके ना कि किसी पीड़ित बच्चे को सबके सामने शर्मिंदा करें. इसके अलावा स्कूलों में कॉन्फिडेंशियल रिर्पोटिंग सिस्टम काउंसलिंग की सुविधा और स्पष्ट जांच प्रक्रिया का भी होना बहुत जरूरी है. 

जवाबदेही तय करना भी होगा जरूरी 

एक्सपर्ट्स का कहना है कि केवल सहानुभूति के पाठ पढ़ाने भर से बुलिंग खत्म नहीं हो सकती. इसके साथ जवाबदेही तय करना भी उतना ही जरूरी है. गंभीर या बार-बार होने वाले बुलिंग के मामले में सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई, पीड़ितों की सुरक्षा और उचित फॉलो अप बहुत जरूरी है. अगर स्कूल बच्चों को गणित या विज्ञान की तरह आपसी सम्मान सीखने की ट्रेनिंग को भी उतनी गंभीरता से सिखाया जाए, तो इस समस्या पर काफी हद तक काबू पाया जा सकता है.

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