उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में अयोध्या का दसवां दीपोत्सव भक्ति, संस्कृति और विश्व बंधुत्व का बड़ा उत्सव बनकर सामने आया है. सरयू तट पर जलते दीपों से लेकर रामकथा पार्क में भगवान श्रीराम के प्रतीकात्मक राज्याभिषेक तक हर आयोजन में भारतीय परंपरा की झलक दिखाई दी. इस बार दीपोत्सव में देश के अलग-अलग राज्यों के कलाकारों के साथ विदेशी कलाकारों और पर्यटकों ने भी हिस्सा लिया. अर्जेंटीना, रूस और अमेरिका से आए लोगों ने रामनगरी में दीप जलाए और सरयू आरती में शामिल हुए.
दस वर्षों में दीपोत्सव का स्वरूप काफी विस्तृत हुआ है. अब यह केवल दीप जलाने और धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं है. इसके जरिए अयोध्या की सांस्कृतिक विरासत को दुनिया के सामने रखा जा रहा है. इस बार साहबगंज की 151 साल पुरानी रामलीला को पहली बार दीपोत्सव के मंच पर जगह मिली. श्रीलंका, लाओस और दक्षिण अफ्रीका की रामलीलाओं ने भी अपनी प्रस्तुतियों से दर्शकों का ध्यान खींचा.
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दस वर्षों में बदल गई दीपोत्सव की पहचान
योगी सरकार में शुरू हुई दीपोत्सव की यात्रा ने दस साल पूरे कर लिए हैं. इस दौरान आयोजन का दायरा लगातार बढ़ा है. राम की पैड़ी पर दीप प्रज्ज्वलन, सरयू आरती, रामकथा और सांस्कृतिक कार्यक्रम इसकी पहचान बन चुके हैं. अब इसमें देश और विदेश की रामायण परंपराओं को भी शामिल किया जा रहा है.
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस आयोजन को अयोध्या की सांस्कृतिक पहचान से जोड़ने पर जोर दिया है. उनका उद्देश्य रामकथा और स्थानीय परंपराओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाना है. दीपोत्सव में संतों, कलाकारों और आम लोगों की भागीदारी भी इसी सोच का हिस्सा है.
इस बार मुख्यमंत्री ने भगवान श्रीराम के स्वरूप का स्वागत किया और राम रथ खींचा. रामकथा पार्क में उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन की मौजूदगी में भगवान श्रीराम का प्रतीकात्मक राज्याभिषेक हुआ. इस आयोजन ने राम के अयोध्या आगमन की स्मृति को उत्सव का रूप दिया.
आधुनिक तकनीक से दिखाई जा रही रामकथा
दीपोत्सव में परंपरा के साथ आधुनिक तकनीक का भी इस्तेमाल किया जा रहा है. प्रकाश संयोजन, प्रोजेक्शन और दृश्य प्रस्तुतियों के जरिए रामायण के प्रसंगों को दर्शकों के सामने रखा जा रहा है. इससे रामकथा को नए अंदाज में समझने का मौका मिल रहा है. आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल से युवा पीढ़ी भी इन प्रस्तुतियों से जुड़ रही है. इसका उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और धार्मिक विरासत को सरल तरीके से लोगों तक पहुंचाना है. दीपोत्सव अब धार्मिक आस्था के साथ सांस्कृतिक शिक्षा का माध्यम भी बन रहा है.
विदेशी रामलीलाओं ने बढ़ाई आयोजन की वैश्विक पहचान
अयोध्या के दीपोत्सव में इस बार विदेशों की रामायण परंपराओं को भी मंच मिला. श्रीलंका, लाओस और दक्षिण अफ्रीका के कलाकारों ने अपनी-अपनी शैली में रामलीला प्रस्तुत की. इन देशों में रामकथा को अलग-अलग भाषा, संगीत, वेशभूषा और अभिनय के जरिए दिखाया जाता है. इन प्रस्तुतियों से यह संदेश सामने आया कि भगवान राम की कथा केवल भारत तक सीमित नहीं है. दुनिया के कई देशों में रामायण की अपनी सांस्कृतिक परंपराएं हैं. अयोध्या में इनका एक साथ मंचन अलग-अलग देशों के बीच सांस्कृतिक जुड़ाव को मजबूत करता है.
इसके अलावा असम, जम्मू-कश्मीर, केरल, उत्तराखंड और बंगाल की लोककलाओं को भी मंच मिला. इससे भारत की सांस्कृतिक विविधता की झलक देखने को मिली. एक ही आयोजन में अलग-अलग राज्यों और देशों की प्रस्तुतियों ने दीपोत्सव को अंतरराष्ट्रीय स्वरूप दिया.
151 साल पुरानी साहबगंज रामलीला को पहली बार मिला मंच
इस बार दीपोत्सव का एक खास आकर्षण साहबगंज की 151 साल पुरानी रामलीला रही. इसे पहली बार दीपोत्सव के मंच पर प्रस्तुति देने का मौका मिला. अयोध्या अंतरराष्ट्रीय रामायण एवं वैदिक शोध संस्थान के सलाहकार आशुतोष द्विवेदी ने इसे अयोध्या की सबसे पुरानी रामलीला बताया है. केंद्रीय रामलीला कमेटी के जिलाध्यक्ष मनोज जायसवाल के अनुसार, इस रामलीला की प्रस्तुति का यह 151वां वर्ष है. स्थानीय रामलीलाओं का अवलोकन करने के बाद इसका चयन किया गया.
इस पहल से स्थानीय कलाकारों को बड़ा मंच मिला है. पीढ़ियों से रामकथा का मंचन कर रहे कलाकारों को सम्मान मिलने के साथ उनकी परंपरा को भी पहचान मिल रही है. विदेशी कलाकारों के साथ स्थानीय रामलीला को जगह देना इस आयोजन की खास बात रही. दीपोत्सव के दौरान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने संतों को मिष्ठान और उपहार भी भेंट किए. संतों ने अयोध्या को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने के प्रयासों की सराहना की.
अमेरिका, अर्जेंटीना और रूस से पहुंचे पर्यटक
दीपोत्सव में विदेशी पर्यटकों की भागीदारी भी देखने को मिली. अमेरिका के शिकागो से आए पॉल और शेल्बे ने सरयू आरती में हिस्सा लिया. उन्होंने राम की पैड़ी पर स्थानीय लोगों के साथ दीप जलाए. उनके लिए अयोध्या की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं को करीब से देखना खास अनुभव रहा.
अर्जेंटीना और रूस के सेंट पीटर्सबर्ग से भी लोग अयोध्या पहुंचे. कोई रामकथा को समझने आया तो किसी को यहां की आध्यात्मिक परंपराओं ने आकर्षित किया. विदेशी मेहमानों ने स्थानीय लोगों के साथ उत्सव में भाग लिया. इससे उन्हें भारतीय संस्कृति और सामुदायिक जीवन को करीब से जानने का मौका मिला.
पर्यटन और स्थानीय कलाकारों के लिए बढ़े अवसर
दीपोत्सव के बढ़ते दायरे से अयोध्या के पर्यटन को भी नई पहचान मिल रही है. देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों की संख्या बढ़ने से स्थानीय कलाकारों, हस्तशिल्पियों और पर्यटन से जुड़े लोगों के लिए अवसर पैदा हो रहे हैं. स्थानीय रामलीलाओं और लोककलाओं को बड़े मंच पर जगह मिलने से कलाकारों को अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका मिल रहा है. वहीं विदेशी प्रस्तुतियों से अयोध्या का सांस्कृतिक जुड़ाव दूसरे देशों तक पहुंच रहा है.
दसवें दीपोत्सव में सरयू तट का प्रकाश, 151 साल पुरानी रामलीला और विदेशी कलाकारों की प्रस्तुतियां एक साथ दिखाई दीं. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में यह आयोजन अयोध्या की विरासत को सहेजने और दुनिया तक पहुंचाने का माध्यम बन रहा है. इसका उद्देश्य आस्था के साथ संस्कृति, पर्यटन और स्थानीय प्रतिभाओं को भी आगे बढ़ाना है.
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