
1855 में इंडियन सिविल सर्विस यानी आईसीएस के लिए पहली बार प्रतियोगी परीक्षा की व्यवस्था शुरू हुई. इससे पहले ईस्ट इंडिया कंपनी में सरकारी पदों पर नियुक्तियां मुख्य रूप से नामांकन और सिफारिश के आधार पर होती थी. नई व्यवस्था में परीक्षा के जरिए चयन का सिद्धांत आया, लेकिन परीक्षा लंदन में और अंग्रेजी में होती थी. ऐसे में भारत में पढ़ने वाले युवाओं के लिए परीक्षा तक पहुंचना अपने आप में बड़ी चुनौती था. उम्मीदवारों को परीक्षा देने के लिए इंग्लैंड जाना पड़ता था.

इसी दौर में सत्येंद्रनाथ टैगोर ने इतिहास बनाया. वह 1862 में इंग्लैंड गए और 1863 में आईसीएस परीक्षा पास की. इसके साथ ही सेवा में शामिल होने वाले वह पहले भारतीय बने. हालांकि भारतीयों के लिए यह रास्ता आसान नहीं हुआ. परीक्षा की अधिकतम उम्र धीरे-धीरे कम करके 19 साल कर दी गई.1919 तक 1255 आईसीएस अधिकारियों में सिर्फ 78 भारतीय थे.

आईसीएस परीक्षा को भारत भी आयोजित करने की मांग काफी पहले उठने लगी थी. इसी मुद्दे को लेकर सुरेंद्रनाथ बनर्जी ने 1877 में देश के कई हिस्सों का दौरा किया. उन्होंने ट्रेन से अलग-अलग शहरों में जाकर सभाएं की और परीक्षा भारत और इंग्लैंड में एक साथ आयोजित करने की मांग के समर्थन में लोगों को जोड़ा. इस अभियान में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भी आईसीएस परीक्षा भारत और इंग्लैंड में एक साथ कराने की मांग को आगे बढ़ाया. इसके बाद आखिरकार 1922 में पहली बार आईसीएस परीक्षा भारत में इलाहाबाद में आयोजित हुई, जबकि दूसरी तरफ परीक्षा लंदन में भी हुई थी.

भारत सरकार अधिनियम 1919 और ली आयोग की सिफारिश के बाद 1 अक्टूबर 1926 को पब्लिक सर्विस कमिशन की स्थापना हुई. इसके पहले अध्यक्ष ब्रिटेन की होम सिविल सर्विस से आए हो सर रॉस बार्कर थे. आयोग का दफ्तर दिल्ली के मेटकाफ हाउस में था. उस समय आयोग की शक्तियां समिति थी और उसकी भूमिका मुख्य रूप से सरकारी सेवाओं में भर्ती से जुड़ी सलाह और प्रक्रिया तक सीमित थी. इसके बावजूद पहली बार भारत में एक स्थायी भर्ती संस्था मौजूद थी. यही वजह है कि यूपीएससी अपनी संस्थागत यात्रा की शुरुआत 1926 से मानी जाती है.

समय के साथ आयोग का स्वरूप भी बदला. 1937 में इसे फेडरल पब्लिक सर्विस कमीशन कहा गया. आजादी के बाद संविधान लागू होने पर 26 जनवरी 1950 को उसका नाम बदलकर यूनियन पब्लिक सर्विस कमीशन यानी यूपीएससी कर दिया गया. इसे संविधान के पार्ट XIV में आर्टिकल 315 से 323 के तहत जगह मिली. संवैधानिक व्यवस्था ने आयोग को सरकारी नियुक्तियों में स्वतंत्रता और निष्पक्षता बनाए रखने के लिए कई सुरक्षा दी. आयोग के खर्च कंसोलिएटेड फंड ऑफ इंडिया पर चार्जड होते हैं और इसके कामकाज से जुड़ी वार्षिक रिपोर्ट राष्ट्रपति को सौंपी जाती है.

वहीं आज यूपीएससी केवल सिविल सर्विस एग्जामिनेशन तक सीमित नहीं है. आयोग आईएएस, आईपीएस और इंडियन फॉरेन सर्विस समेत कई सेवाओं इंडियन फॉरेस्ट सर्विस, इंजीनियरिंग सर्विस, कंबाइंड मेडिकल सर्विस, एनडीए और नेवल एकेडमी, सीडीएस और सेंट्रल आर्म्ड पुलिस फोर्स में भर्ती के लिए परीक्षा आयोजित करता है. वहीं बीते 100 वर्षों में परीक्षा व्यवस्था का पैमाना भी काफी बढ़ा है. आयोग के आंकड़ों के अनुसार 1950-51 में विभिन्न परीक्षाओं और सिलेक्शन बेस्ड रिक्रूटमेंट के लिए करीब 42,727 आवेदन आए थे, जबकि 2022 में यह संख्या 45 लाख से ज्यादा पहुंच गई.

यूपीएससी की भर्ती प्रक्रिया समय के साथ तकनीकी आधारित भी हुई. 2026 की सिविल सर्विस प्रीलिम्स एग्जामिनेशन में करीब 5.50 लाख उम्मीदवारों के लिए फेस ऑथेंटिकेशन का इस्तेमाल किया गया. इसके अलावा इंटरव्यू बोर्ड के क्रम को रेंडमाइज करने और परीक्षा के बाद प्रोविजनल आंसर की जारी करने जैसे कदम भी प्रक्रिया में शामिल हुए.
Published at : 02 Oct 2026 08:31 AM (IST)














