देश में उच्च शिक्षण संस्थानों में पढ़ने वाले छात्रों की मानसिक सेहत को लेकर एक सर्वे में गंभीर तस्वीर सामने आई है. सुप्रीम कोर्ट की ओर से गठित नेशनल टास्क फोर्स (NTF) के देशव्यापी सर्वे में करीब 2.43 लाख से ज्यादा छात्रों के रिएक्शन शामिल है. इनमें लगभग 9% छात्रों ने बताया कि पिछले 1 साल में उन्हें आत्महत्या के विचार आए हैं. वहीं करीब 15% छात्रों ने कहा कि पिछले 6 महीना में वह लंबे समय तक तनाव, खराब मूड और एंग्जायटी जैसी स्थिति से गुजरे हैं. यह आंकड़े NTF की अंतिम रिपोर्ट में भी शामिल किए जाएंगे, जिसे उच्च शिक्षण संस्थानों में छात्रों की मानसिक सेहत और आत्महत्या रोकने के उपाय को लेकर तैयार किया जा रहा है. रिपोर्ट 31 अक्टूबर 2026 तक सुप्रीम कोर्ट में पेश किए जाने की उम्मीद है. हालांकि टास्क फोर्स ने साफ किया है कि सर्वे का सैंपल पूरे देश के छात्र समुदाय का प्रतिनिधित्व नहीं करता है. इन आंकड़ों को शुरुआती और अस्थायी निष्कर्ष के तौर पर देखा जाना चाहिए.
34% छात्र बोले कैंपस में बाहरी जैसा होता है महसूस
सर्वे में छात्रों से उनके कैंपस के माहौल को लेकर भी सवाल किए गए. इसमें करीब 34 प्रतिशत छात्रों ने बताया कि उन्होंने किसी न किसी स्तर पर अपने संस्थान में खुद को बाहरी जैसा महसूस किया है. सर्वे में शामिल करीब 67% छात्र एसटी, एससी और ओबीसी समुदायों से थे. एनटीएफ के काम के दौरान उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव, लैंगिक भेदभाव, यौन उत्पीड़न, भाषा से जुड़ी बाधाओं और छात्रों को मिलने वाले असमान एकेडमिक सहयोग जैसे मुद्दों पर भी ध्यान दिया गया.
सिर्फ 56% छात्रों को प्रशासन पर भरोसा
इस सर्वे में संस्थान और उसके प्रशासन पर छात्रों के भरोसे को लेकर भी सवाल उठे. सर्वे के अनुसार सिर्फ 56 प्रतिशत छात्रों ने कहा कि उन्हें भरोसा है कि उनके संस्थान गंभीर मामलों को निष्पक्ष तरीके से संभालेगा. वहीं करीब 32 प्रतिशत छात्रों ने बताया कि उनके संस्थान में काउंसलिंग की सुविधा उपलब्ध नहीं है. इससे काउंसलिंग की उपलब्धता के साथ-साथ छात्रों तक उसकी पहुंच और संस्थान की व्यवस्था पर भरोसे का सवाल भी सामने आते हैं.
70% से ज्यादा संस्थानों में नहीं मेंटल हेल्थ प्रोफेशनल
एनटीएफ की जांच में मानसिक स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर भी कमियां सामने आई है. रिपोर्ट के अनुसार सर्वे में शामिल 70 प्रतिशत से ज्यादा संस्थानों में फुल टाइम मेंटल हेल्थ प्रोफेशनल्स नहीं थे. वहीं 4% से भी कम संस्थानों में आत्महत्या के खतरे से निपटने के लिए औपचारिक प्रोटोकॉल होने की बात सामने आई. टास्क फोर्स ने छात्रों के अलावा टीचर्स, पेरेंट्स और मेंटल हेल्थ एक्सपर्ट्स और हायर एजुकेशनल इंस्टीट्यूट से भी बातचीत की. सुप्रीम कोर्ट के रिकॉर्ड के अनुसार एनटीएफ ने अलग-अलग राज्यों में 19 संस्थाओं का दौरा किया और 30 बैठकें की.
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IIT छात्रों की मौत के बाद फिर मेंटल हेल्थ चर्चा में
देश के प्रमुख संस्थानों में छात्रों की मौत की घटनाओं के बाद मानसिक स्वास्थ्य का मुद्दा भी एक बार फिर चर्चा में है. आईआईटी बॉम्बे के छात्र साहिल वाकोडे की 18 सितंबर को मौत के बाद कैंपस में छात्रों ने प्रदर्शन किया. इसके अलावा दूसरे आईआईटी इंस्टीट्यूट में भी छात्रों की मौत की घटनाओं के बाद हॉस्टल में सीलिंग फैन बदलने या एंटी-सुसाइड उपाय जैसे कदम उठाए गए. हालांकि मेंटल हेल्थ एक्सपर्ट और शिक्षा से जुड़े लोगों ने कहा कि केवल भौतिक सुरक्षा उपायों से समस्या का समाधान नहीं होगा. छात्रों को ऐसा माहौल देने की जरूरत है, जहां पर वह अपनी परेशानी खुलकर शेयर कर सके और समय पर उन्हें मदद मिल सके.
सुप्रीम कोर्ट ने भी दिए संस्थाओं को निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी 2026 के आदेश में उच्च शिक्षण संस्थानों में छात्रों की सुरक्षा को लेकर कई निर्देश दिए. इनमें छात्र आत्महत्या या अननेचुरल मौत की जानकारी संबंधित अधिकारियों को देने और नियामको वार्षिक रिपोर्ट सौंपने जैसी व्यवस्था शामिल है. वहीं आवासीय संस्थानों में 24 घंटे चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराने पर भी जोर दिया गया.
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