यमन के हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के दो हवाई अड्डों रियाद का किंग खालिद इंटरनेशनल एयरपोर्ट और दक्षिण-पश्चिमी शहर अभा का इंटरनेशनल एयरपोर्ट को निशाना बनाया. इन हमलों में 3 लोगों की मौत हुई और 36 घायल हुए. रियाद एयरपोर्ट पर करीब 300 फ्लाइट्स रद्द करनी पड़ीं. जवाब में सऊदी गठबंधन ने यमन में हूतियों के 82 ठिकानों पर हवाई हमले किए. हूती प्रवक्ता के दावे के मुताबिक, 2026 की शुरुआत से अब तक सऊदी अरब ने यमन में 1,798 हमले किए हैं, यानी दोनों तरफ से हमले लगातार बढ़ रहे हैं. तो आखिर सऊदी अरब के सामने चुनौती कितनी बड़ी है…
🚨 Explosions and heavy smoke reported near Riyadh’s King Khalid International Airport following a claimed Houthi missile attack. 🇸🇦 Saudi Arabia reported intercepting missiles, while flight disruptions were reported. The exact impact and damage remain unverified. #BreakingNews #Riyadh #RiyadhAirport #KingKhalidAirport #Yemen #Houthis #MissileAttack
— Abu Taimur🐅 (@GH4LL) October 9, 2026
आखिर सऊदी अरब से हूती क्या चाहते हैं?
हूतियों का साफ मैसेज है, ‘एस्केलेशन फॉर एस्केलेशन’ यानी जितना हमला तुम करोगे, उतना जवाब मिलेगा. हालांकि, असली कहानी इससे गहरी है. सितंबर 2026 में हूतियों ने लाल सागर तट पर रणनीतिक बंदरगाह मोखा पर कब्जा कर लिया और बाब-अल-मंदाब जलडमरूमध्य के पास हनीश द्वीपसमूह, मायुन द्वीप और धुबाब शहर जैसे द्वीपों पर भी कब्जा जमाया. बाब-अल-मंदाब जलडमरूमध्य लाल सागर और स्वेज नहर के रास्ते पर है. यह दुनिया के सबसे अहम व्यापारिक और ऊर्जा गलियारों में से एक है.
हूती अब सऊदी अरब की जमीन पर सीधे हमले कर रहे हैं. उन्होंने सऊदी हवाई क्षेत्र को ‘ऑपरेशन एरिया’ घोषित कर दिया है, यानी कानूनी तौर पर पूरे सऊदी अरब को युद्ध क्षेत्र मान लिया है. यह पहले की सीमित सीमा पार गोलीबारी से बिल्कुल अलग बात है.
सऊदी की जान बनी सबसे बड़ा निशाना
सऊदी अरब दुनिया का सबसे बड़ा तेल निर्यातक है. इस वक्त उसकी तेल अर्थव्यवस्था दो तरफ से घिरी है. होर्मुज जलडमरूमध्य ईरान की वजह से बंद पड़ा है. बाब-अल-मंदाब पर हूतियों का कब्जा है. सऊदी के पास होर्मुज से बचने का एक ही रास्ता था- ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन. यह पूर्वी सऊदी से तेल लेकर लाल सागर के यनबू बंदरगाह तक जाती है, लेकिन 10 सितंबर 2026 को इस पाइपलाइन पर हमला हो गया.
नतीजतन, सऊदी अरब का कच्चा तेल उत्पादन अगस्त में घटकर 6.24 मिलियन बैरल प्रतिदिन रह गया, जो 1990 के बाद का सबसे निचला स्तर है. यह जुलाई के मुकाबले 23 प्रतिशत की गिरावट है. युद्ध से पहले फरवरी में उत्पादन 10.1 मिलियन बैरल प्रतिदिन था. तेल निर्यात अगस्त में घटकर 3.1 मिलियन बैरल प्रतिदिन रह गया, जो जुलाई में 5.1 मिलियन था. ब्रेंट क्रूड की कीमत पहली बार जुलाई के बाद 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच गई.
सऊदी अरब तेल बेचना चाहता है और कीमतें भी ऊंची हैं, लेकिन वह तेल बाहर भेज ही नहीं पा रहा.
हूती हमले रोकना सऊदी अरब के लिए मुश्किल क्यों?
सऊदी के पास अमेरिकी पैट्रियट और थाड सिस्टम हैं, लेकिन हूती जो हथियार इस्तेमाल कर रहे हैं, वे सस्ते हैं और उन्हें रोकना बेहद महंगा है. हूती ड्रोन और मिसाइलें ईरानी डिजाइन की हैं. सऊदी की वायु रक्षा प्रणाली कम ऊंचाई पर उड़ने वाले ड्रोन को पकड़ नहीं पाती.
सितंबर 2026 में सऊदी के इंटरसेप्टर मिसाइल खत्म होने की कगार पर पहुंच गए और उसे फ्रांस, ब्रिटेन, पाकिस्तान और मिस्र से मदद मांगनी पड़ी. यहां तक कि सऊदी ने तेल आपूर्ति बचाने के लिए इजरायल से भी मदद मांगने पर विचार किया.
‘मक्का डिफेंस अलायंस’ कागजी या असली?
अगस्त 2026 में सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान ने ‘मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट’ साइन किया था. इसका मतलब किसी एक पर हमला होगा तो तीनों मिलकर जवाब देंगे. 5 अक्टूबर 2026 को तीनों ने रियाद में आपात बैठक की और सऊदी अरब में सैन्य बलों की तुरंत तैनाती का फैसला किया. पाकिस्तानी लेफ्टिनेंट जनरल नौमान महमूद को अलायंस का पहला सेक्रेटरी-जनरल नियुक्त किया गया.
लेकिन क्या यह अलायंस धरातल पर काम करेगा?
पाकिस्तान और तुर्किये ने समर्थन का वादा तो किया है, लेकिन किसी ने भी हूतियों के खिलाफ सीधे लड़ाई में हिस्सा लेने की घोषणा नहीं की. तुर्किये के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने साफ कह दिया कि यह ‘हमला समझौता नहीं, बचाव समझौता है’ और तुर्की किसी दूसरे देश की जमीन पर हमले के लिए सैनिक नहीं भेजेगा. दूसरी ओर पाकिस्तान ने सेना और वायुसेना भेज दी है.
सऊदी अरब की सबसे बड़ी उम्मीद अमेरिका से थी, लेकिन वाशिंगटन का रुख साफ नहीं है. सितंबर 2026 में सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने ट्रंप से हूतियों के खिलाफ सैन्य मदद मांगी, लेकिन ट्रंप ने सीधे दखल देने से इनकार कर दिया.
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने कहा कि अमेरिका का सऊदी के साथ रक्षा समझौता है और ‘हम उस पर खरा उतरने का इरादा रखते हैं,’ लेकिन इससे आगे कुछ नहीं बताया. यानी अमेरिका सऊदी अरब को अकेला छोड़ रहा है.
अब सऊदी अरब के सामने असली चुनौती क्या?
एक्सपर्ट्स का मानना है कि सऊदी अरब की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि उसके पास हूती हमलों का कोई आसान जवाब नहीं है. अगर वह और हमले करता है, तो हूती और बड़े हमलों से जवाब देंगे. अगर बातचीत करता है, तो हूतियों को वैध शक्ति मानने का संकेत जाएगा. सऊदी अरब के सामने 3 बड़ी चुनौतियां हैं:
- ‘विजन 2030’ पर सीधा असर: लगातार हमलों की वजह से सऊदी को डिफेंस और इमरजेंसी खर्चों के लिए ‘विजन 2030’ के गैर-जरूरी प्रोजेक्ट्स से पैसा हटाना पड़ रहा है. लाल सागर में जहाजों का बीमा प्रीमियम कई गुना बढ़ गया है, जिससे विदेशी निवेशकों का भरोसा टूट रहा है.
- एयर डिफेंस मिसाइल खत्म: ईरान युद्ध के 38 दिनों में सऊदी अरब ने अपने 2,800 पैट्रियट PAC-3 इंटरसेप्टर में से 86% इस्तेमाल कर लिए. अब सिर्फ करीब 400 बचे हैं. सऊदी को फ्रांस, ब्रिटेन, पाकिस्तान और मिस्र से मदद मांगनी पड़ी.
- हूती हमले रोकना बेहद महंगा: हूती सस्ते ड्रोन और ईरानी डिजाइन की बैलिस्टिक मिसाइलें इस्तेमाल कर रहे हैं. सऊदी की वायु रक्षा प्रणाली कम ऊंचाई पर उड़ने वाले ड्रोन को पकड़ नहीं पाती. हूतियों ने सितंबर में मोखा बंदरगाह और बाब-अल-मंदाब के पास कई द्वीपों पर कब्जा कर लिया है.














