पश्चिम एशिया में गहराते सैन्य संकट और ईरान के साथ बढ़ते प्रत्यक्ष टकराव के बीच अमेरिका ने अरब जगत और फारस की खाड़ी में अपनी सैन्य मौजूदगी को अब तक के सबसे उच्चतम स्तर पर पहुंचा दिया है. अल जज़ीरा की रिपोर्ट के अनुसार, वाशिंगटन ने ईरान की चौतरफा घेराबंदी करने और अपने क्षेत्रीय सहयोगियों को सुरक्षा चक्र प्रदान करने के लिए विशाल नौसैनिक बेड़े, आधुनिक लड़ाकू जेट और अतिरिक्त थल सेना की तैनाती तेज कर दी है.
इस बड़े सैन्य जमावड़े का भू-राजनीतिक अर्थ क्या है, अरब देश इस तनाव के बीच कैसे पिस रहे हैं और इसका वैश्विक अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा? आइए इसे विस्तार से समझते हैं.
क्या है ‘घेराबंदी’ का मास्टरप्लान?
अल जज़ीरा की रिपोर्ट बताती है कि पेंटागन की रणनीति केवल ईरान के किसी संभावित हमले का जवाब देना नहीं है, बल्कि उसके वायु, नौसैनिक और मिसाइल तंत्र को पूरी तरह से पंगु बनाना है.
दशकों में यह पहली बार हुआ है जब अमेरिका ने फारस की खाड़ी, ओमान की खाड़ी और अरब सागर के क्षेत्र में एक साथ तीन एयरक्राफ्ट कैरियर स्ट्राइक ग्रुप्स तैनात किए हैं. USS अब्राहम लिंकन सहित अमेरिकी बेड़े में दर्जनों मिसाइल क्रूजर और गाइडेड-मिसाइल डिस्ट्रॉयर शामिल हैं.
जॉर्डन के मुवफ्फक सल्ती एयर बेस और कतर के अल-उदैद सैन्य बेस पर अमेरिका ने F-15E स्ट्राइक ईगल्स और स्टील्थ लड़ाकू विमानों की तैनाती कई गुना बढ़ा दी है.
पेंटागन ने क्षेत्र में मरीन एक्सपेडिशनरी यूनिट्स (2,000 से अधिक मरीन) और थल सेना की विशेष टुकड़ियों को उतारा है ताकि महत्वपूर्ण ठिकानों और जहाजरानी मार्गों को सुरक्षा प्रदान की जा सके.
हॉर्मुज जलडमरूमध्य और लाल सागर का सामरिक महत्व
ईरान को घेरने के अमेरिकी कदम का सबसे बड़ा केंद्र बिंदु हॉर्मुज जलडमरूमध्य और लाल सागर हैं. दुनिया के कुल कच्चे तेल का लगभग 20% आपूर्ति मार्ग हॉर्मुज की संकरी समुद्री पट्टी से गुजरता है. रिपोर्ट के अनुसार ईरान ने इस रणनीतिक रास्ते पर नियंत्रण हासिल करने और टैंकरों की आवाजाही को बाधित करने की चेतावनी दी है.
अमेरिका और उसके मित्र देशों के नौसैनिक जहाजों की प्राथमिकता तेल टैंकरों और मालवाहक जहाजों को सुरक्षा प्रदान करना है ताकि वैश्विक ऊर्जा बाजार में बड़ा भूचाल न आए.
अरब दुनिया का रुख: दोहरे संकट में खाड़ी देश
सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), कतर और कुवैत जैसे अरब देश इस संघर्ष के सबसे संवेदनशील मोड़ पर खड़े हैं. ये देश अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अमेरिकी सैन्य छतरी पर निर्भर हैं और क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए अमेरिकी मौजूदगी का समर्थन करते हैं.
अल जज़ीरा के मुताबिक, खाड़ी देशों को डर है कि यदि अमेरिका उनके सैन्य अड्डों का उपयोग सीधे ईरान पर बड़े हमलों के लिए करता है, तो ईरान और उसके सहयोगी (जैसे यमन के हूती या इराक के शिया मिलिशिया) उनके तेल बुनियादी ढांचों को निशाना बना सकते हैं.
यही कारण है कि सऊदी अरब और कतर जैसे देश अमेरिका को अपने हवाई क्षेत्र का उपयोग सीधे आक्रामक हमलों के लिए देने में सतर्कता बरत रहे हैं और पर्दे के पीछे कूटनीतिक रास्ते खोजने पर जोर दे रहे हैं.
ईरान की प्रतिक्रिया
अमेरिका की इस विशाल घेराबंदी के जवाब में ईरान ने भी अपनी रक्षा और आक्रामक प्रणालियों को पूरी तरह सक्रिय कर दिया है. ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के पास बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलों के साथ-साथ सुसाइड ड्रोन्स (Shahed Drones) का विशाल भंडार है. ईरान की दक्षिणी तटरेखा पर पहाड़ों के नीचे छिपे ‘मिसाइल शहरों’ और नौसैनिक स्पीड-बोट्स की मदद से वह अमेरिकी जहाजों को भारी नुकसान पहुँचाने की रणनीति बना रहा है.
लेबनान, सिरिया, इराक और यमन में स्थित ईरान-समर्थित समूह अमेरिकी अड्डों पर दबाव बनाए हुए हैं.
वैश्विक अर्थव्यवस्था पर इसका क्या असर होगा?
मध्य पूर्व में अमेरिकी सेना के इस बड़े जमावड़े और ईरान के साथ पैदा हुए टकराव ने वैश्विक अर्थव्यवस्था के सामने बड़ा जोखिम खड़ा कर दिया है. फारस की खाड़ी में जरा सी सैन्य झड़प से कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतें $100 प्रति बैरल का आंकड़ा पार कर सकती हैं, जिससे वैश्विक स्तर पर महंगाई बढ़ेगी.
लाल सागर और हॉर्मुज से गुजरने वाले जहाजों का बीमा प्रीमियम कई गुना बढ़ गया है, जिससे उपभोक्ता वस्तुओं का परिवहन महंगा हो रहा है.
रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि अमेरिका की रणनीति ईरान को सैन्य शक्ति के प्रदर्शन से पूरी तरह से पीछे हटने पर मजबूर करना है. हालांकि, अरब दुनिया में अमेरिका की इतनी बड़ी सैन्य तैनाती ने पूरे क्षेत्र को एक ‘पाउडर के पीपे’ पर बिठा दिया है. यदि कूटनीतिक वार्ता के रास्ते तुरंत नहीं तलाशे गए, तो एक छोटी सी सैन्य चूक पूरे मध्य पूर्व को ऐसे व्यापक युद्ध में धकेल सकती है, जिसकी लपटें पूरी दुनिया को प्रभावित करेंगी.














