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क्या LGBTQ प्रवासियों को खतरे वाले देशों में भेज रहा US? क्या है मामला


मेरिका में शरण की उम्मीद लेकर पहुंची 28 साल की एक तुर्की महिला को वहां के एक इमिग्रेशन जज ने उसके देश लौटने पर जान को खतरा मानते हुए कानूनी सुरक्षा दी थी. इसके बावजूद उसे अमेरिका ने उसके अपने देश तुर्की भेजने के बजाय मध्य अफ्रीकी गणराज्य भेज दिया. खास बात यह है कि महिला ने इस देश का नाम तक फ्लाइट में बैठने से पहले नहीं सुना था और वह कभी वहां गई भी नहीं थी.

सीएनएन से बातचीत में महिला ने बताया कि वह समलैंगिक है और तुर्की में एक धार्मिक समूह और परिवार के एक सदस्य की ओर से उसे जान से मारने की धमकियां मिली थीं. इसी वजह से उसने तुर्की छोड़ दिया था. वह अमेरिका इस उम्मीद में पहुंची थी कि वहां वह अपनी पहचान के साथ खुलकर और सुरक्षित जिंदगी जी सकेगी. सुरक्षा कारणों से सीएनएन ने महिला का नाम बदलकर ‘आयलिन’ रखा है. आयलिन ने कहा, “मैं बस आजाद होना चाहती थी. अपनी जिंदगी अपनी तरह जीना चाहती थी, सांस लेना चाहती थी. दोस्त, एक रिश्ता, एक अच्छा परिवार और अपना परिवार चाहती थी. न्याय चाहती थी.”

जज ने माना था कि तुर्की लौटने पर खतरा है

अमेरिका पहुंचने के बाद आयलिन को वहां के इमिग्रेशन जज ने ‘विदहोल्डिंग ऑफ रिमूवल’ की कानूनी सुरक्षा दी. इसका मतलब था कि उसकी यौन पहचान के कारण तुर्की लौटने पर उसे जिस खतरे का सामना करना पड़ सकता है, उसे देखते हुए उसे वहां वापस भेजने से सुरक्षा दी गई.

हालांकि, उसे अमेरिका में शरण यानी असाइलम नहीं मिला. सीएनएन के मुताबिक, इसकी वजह बाइडन प्रशासन के दौर की वह नीति थी, जिसके तहत अमेरिका-मेक्सिको सीमा से आधिकारिक रास्तों के बाहर प्रवेश करने वाले कई प्रवासियों के लिए असाइलम पाने की पात्रता सीमित कर दी गई थी. बाद में एक संघीय जज ने इस नीति को रद्द कर दिया.

18 महीने हिरासत में रही, फिर तीसरे देश भेज दिया

आयलिन करीब 18 महीने तक अमेरिका की हिरासत में रही. इसके बाद जुलाई में उसे हथकड़ी और बेड़ियां लगाकर एक विमान में बैठाया गया. उसे रास्ते में पता चला कि उसे तुर्की नहीं, बल्कि मध्य अफ्रीकी गणराज्य भेजा जा रहा है. यह देश उसके लिए पूरी तरह अनजान था. वह इससे पहले कभी वहां नहीं गई थी और न ही उसे पता था कि उसे वहां क्यों भेजा जा रहा है.

अमेरिका की ‘थर्ड कंट्री डिपोर्टेशन’ नीति पर सवाल

आयलिन का मामला अमेरिका की उस बढ़ती नीति को लेकर सवाल खड़े करता है, जिसमें प्रवासियों को उनके मूल देश के बजाय किसी तीसरे देश में भेजा जा रहा है. इमिग्रेशन अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठनों के मुताबिक, ट्रंप प्रशासन ने अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और दुनिया के दूसरे हिस्सों के देशों के साथ कम से कम 35 ऐसे समझौते किए हैं, जिनके तहत वे अमेरिका से भेजे जाने वाले प्रवासियों को स्वीकार कर सकते हैं. यह आंकड़ा ‘थर्ड कंट्री डिपोर्टेशन वॉच’ के हवाले से सामने आया है. इनमें एलजीबीटीक्यू समुदाय से जुड़े प्रवासी भी शामिल हैं. इनमें से कई लोगों का कहना है कि उन्हें अपनी यौन पहचान या जेंडर पहचान के कारण उत्पीड़न का डर है.

मध्य अफ्रीकी गणराज्य में भी डर के साए में रही

मध्य अफ्रीकी गणराज्य की राजधानी बांगुई पहुंचने के बाद आयलिन कई हफ्तों तक एक अपार्टमेंट में रही. उसे समझ नहीं आ रहा था कि आगे उसके साथ क्या होगा. मध्य अफ्रीकी गणराज्य में समलैंगिक होना गैरकानूनी नहीं है, लेकिन 2023 की अमेरिकी विदेश विभाग की रिपोर्ट में वहां समलैंगिक संबंध में रहना “बेहद खतरनाक” बताया गया था. इन परिस्थितियों और डर के बावजूद आयलिन ने आखिरकार तुर्की लौटने का फैसला किया. तुर्की जाने से पहले उसने सीएनएन से कहा, “मुझे उम्मीद है कि तुर्की में मेरे जैसे लोगों के लिए सब कुछ बदल गया होगा. लेकिन मैं बहुत डरी हुई हूं. सच में, बहुत डरी हुई हूं.”

एक और एलजीबीटीक्यू महिला को भेजा गया कैमरून

आयलिन इस नीति से प्रभावित होने वाली अकेली एलजीबीटीक्यू प्रवासी नहीं है. 21 साल की घाना की महिला अदवोआ ने बताया कि अपनी यौन पहचान के कारण उसे वर्षों तक विरोध, दुश्मनी और हिंसा का सामना करना पड़ा.
एक अमेरिकी अदालत ने उसे घाना भेजे जाने से रोक दिया था. इसके बाद उसे घाना के बजाय कैमरून भेज दिया गया. कैमरून में समलैंगिक संबंध गैरकानूनी हैं और इसके लिए पांच साल तक की जेल हो सकती है. अदवोआ ने बताया कि कैमरून में उसे कई महीनों से सरकार द्वारा संचालित हिरासत केंद्र में रखा गया है. उसने अपनी स्थिति बताते हुए कहा, “ऐसा लगता है जैसे आप अपराधी हैं.” उसने इसे बेहद डरावना अनुभव बताया.

मानवाधिकार संगठनों ने जताई चिंता

एलजीबीटीक्यू प्रवासियों को कानूनी मदद देने वाली संस्था इमिग्रेशन इक्वैलिटी की ब्रिजेट क्रॉफर्ड ने कहा कि ऐसे लोगों को उन देशों में भेजना खास तौर पर चिंता की बात है, जहां उनकी पहचान के कारण उन्हें उत्पीड़न का सामना करना पड़ सकता है. उन्होंने कहा कि अगर किसी समलैंगिक या ट्रांस व्यक्ति को ऐसे देश भेजा जा रहा है, जहां समलैंगिक और ट्रांस लोगों के साथ उत्पीड़न होता है, तो यह बेहद गंभीर और अस्वीकार्य स्थिति है. मानवाधिकार संगठनों की चिंता इसलिए भी बढ़ी है क्योंकि अमेरिका से भेजे जा रहे कई प्रवासियों को अफ्रीकी देशों में भेजा जा रहा है. अफ्रीका के कई देशों में अभी भी समलैंगिक संबंधों को अपराध माना जाता है.

अमेरिका ने कहा- प्रवासियों को कानूनी प्रक्रिया का अधिकार मिलता है

अमेरिका के होमलैंड सिक्योरिटी विभाग ने इन समझौतों का बचाव किया है. विभाग का कहना है कि प्रवासियों को उचित कानूनी प्रक्रिया का अधिकार दिया जाता है और तीसरे देशों के साथ किए गए ये समझौते कानून के तहत हैं.
डीएचएस ने कहा कि ये तीसरे देश से जुड़े समझौते अमेरिकी संविधान के तहत उचित कानूनी प्रक्रिया सुनिश्चित करते हैं और देश की सुरक्षा के लिए जरूरी हैं. विभाग ने यह भी कहा कि वह कानून को उसी तरह लागू कर रहा है, जैसा वह लिखा गया है. अगर कोई जज यह तय करता है कि किसी प्रवासी को अमेरिका में रहने का अधिकार नहीं है, तो उसे देश से बाहर भेजा जाएगा.  इसी महीने एक संघीय अपीलीय अदालत ने एक ऐसे फैसले को बरकरार रखा, जिसमें ट्रंप प्रशासन की तीसरे देश में निर्वासन नीति के कुछ हिस्सों को गैरकानूनी माना गया था. यह विवाद आगे चलकर अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंच सकता है.

तुर्की लौटकर भी खुद को आजाद महसूस नहीं कर रही आयलिन

आयलिन अब तुर्की वापस लौट चुकी है. उसने अपने परिवार को बताया है कि उसने अपनी यौन पहचान बदल ली है. लेकिन इसके बावजूद उसका कहना है कि वह खुद को आजाद महसूस नहीं कर रही है. आयलिन ने सीएनएन से कहा, “मैं नौकरी ढूंढूंगी, पैसे कमाऊंगी और चुपचाप यूरोप या किसी दूसरी जगह चली जाऊंगी. मैं यहां खुद को अपने जैसा महसूस नहीं कर सकती.”

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