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Explained: क्या नेतन्याहू का युग समाप्त होने की कगार पर? आज वोटिंग, जानिए सबकुछ


आज, 27 अक्टूबर 2026 को इजराइल के इतिहास के सबसे अहम आम चुनाव हो रहे हैं. देश के 73 लाख से अधिक पंजीकृत मतदाता इस बात का फैसला करने के लिए मतदान केंद्रों पर पहुंच रहे हैं कि क्या बेंजामिन नेतन्याहू प्रधानमंत्री बने रहेंगे या फिर देश में एक नए नेतृत्व का उदय होगा. यह चुनाव केवल एक आम राजनीतिक मुकाबला नहीं है, बल्कि इसे नेतन्याहू के राजनीतिक अस्तित्व पर सीधा जनमत संग्रह माना जा रहा है.

इस चुनाव के परिणामों पर न केवल इजराइल बल्कि पूरी दुनिया की नज़रें टिकी हुई हैं, क्योंकि इसके नतीजे मध्य-पूर्व की भू-राजनीति और क्षेत्रीय सुरक्षा को लंबे समय तक प्रभावित करेंगे.

राजनीतिक अस्तित्व दांव पर और कानूनी चुनौतियां

वर्तमान चुनाव बेंजामिन नेतन्याहू के लिए व्यक्तिगत और राजनीतिक दोनों दृष्टियों से निर्णायक मोड़ है. यदि वे और उनका गठबंधन इस चुनाव में हार जाते हैं, तो वे सत्ता से पूरी तरह बाहर हो जाएंगे. इसके साथ ही, उनका राजनीतिक सुरक्षा कवच भी समाप्त हो जाएगा.

सत्ता से बेदखल होने पर उनके प्रशासन को जनता और न्यायपालिका के कड़े सवालों का सामना करना पड़ेगा. विशेष रूप से, 7 अक्टूबर, 2023 को हुए हमलों से जुड़ी खुफिया और सुरक्षा व्यवस्था की गंभीर विफलताओं को लेकर एक स्वतंत्र राज्य जांच आयोग के गठन का रास्ता साफ हो जाएगा. इसके अलावा, वे लंबे समय से भ्रष्टाचार के मुकदमों और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिल रहे दबावों का सामना कर रहे हैं. प्रधानमंत्री पद पर बने रहना उनके लिए इन कानूनी और राजनीतिक मोर्चों पर एक ढाल की तरह काम करता रहा है.

मतदान की व्यापक तैयारियां और मतदाता आंकड़े

इज़राइल की केंद्रीय चुनाव समिति ने इस चुनाव को निष्पक्ष और सुचारू रूप से संपन्न कराने के लिए व्यापक लॉजिस्टिक योजना लागू की है, जिस पर लगभग 690 मिलियन इजरायली शेकेल (NIS) की लागत आई है.

इस चुनाव में कुल 7,331,981 नागरिक मतदान के पात्र हैं, जो इज़राइल की कुल 1.03 करोड़ (10.3 मिलियन) आबादी का लगभग 71.15% है. देश भर में कुल 12,018 मतदान केंद्र बनाए गए हैं, जो स्थानीय समयानुसार सुबह 7:00 बजे से रात 10:00 बजे तक खुले रहेंगे.

इज़राइल में डाक द्वारा (मेल-इन) याॉक्सी के जरिए वोट डालने की अनुमति नहीं है. इसके बावजूद, विदेश में रहने वाले लगभग 810,000 पात्र मतदाताओं में से हजारों लोग व्यक्तिगत रूप से अपने मताधिकार का प्रयोग करने के लिए देश लौट रहे हैं.

‘नेसेट’ (संसद) का गणित और बहुमत का आंकड़ा

इज़राइल की संसद, जिसे ‘नेसेट’ कहा जाता है, में कुल 120 सीटें हैं. सरकार बनाने और बहुमत साबित करने के लिए किसी भी पार्टी या गठबंधन को जादुई आंकड़े यानी कम से कम 61 सीटों की आवश्यकता होती है.

इजराइल के चुनावी इतिहास में आज तक किसी भी एक पार्टी को अपने दम पर 61 सीटें नहीं मिली हैं. यही कारण है कि यहां हमेशा गठबंधन सरकारें बनती हैं. चुनाव के बाद यह इस बात पर निर्भर करेगा कि कौन सा नेता विभिन्न दलों के साथ सफलतापूर्वक बातचीत करके बहुमत का यह आंकड़ा जुटा पाता है.

बेंजामिन नेतन्याहू का लंबा राजनीतिक सफर

अक्टूबर 2026 तक, बेंजामिन नेतन्याहू कुल मिलाकर लगभग 19 वर्षों तक देश के प्रधानमंत्री रहे हैं. वे इज़राइल के इतिहास में सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहने वाले नेता हैं, जिन्होंने देश के संस्थापक डेविड बेन-गुरियन के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया है. उनका कार्यकाल तीन अलग-अलग चरणों में बंटा है, पहला कार्यकाल (1996–1999) 3 साल और 18 दिन, दूसरा कार्यकाल (2009–2021) 12 साल और 74 दिन, जो इज़रायली इतिहास में लगातार सबसे लंबा कार्यकाल रहा है और तीसरा कार्यकाल (2022–वर्तमान) दिसंबर 2022 में पदभार संभालने के बाद से यह लगातार जारी है.

नेतन्याहू ने अपने राजनीतिक जीवन के अधिकांश समय में दक्षिणपंथी ‘लिकुड’ पार्टी का नेतृत्व किया है और इज़राइल की छह अलग-अलग सरकारों का सफल या असफल नेतृत्व किया है.

नेतन्याहू के मुख्य राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी

इस बार नेतन्याहू के सामने कई मजबूत चेहरे चुनौती पेश कर रहे हैं जिनमें से कुछ नाम हैं.

गादी आइसेनकोट: पूर्व सैन्य चीफ ऑफ स्टाफ और ‘याशार’ पार्टी के प्रमुख. वे सरकार की जवाबदेही और अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स पुरुषों को सैन्य सेवा से मिलने वाली छूट को खत्म करने के मुद्दों को जोर-शोर से उठा रहे हैं.

नफ्ताली बेनेट और यायर लापिड: ‘टुगेदर’ गठबंधन (बेयाचाद) के माध्यम से ये पूर्व प्रधानमंत्री मौजूदा सत्ता को कड़ी टक्कर दे रहे हैं.

अविग्दोर लिबरमैन: दक्षिणपंथी ‘यिसराएल बेतेनु’ पार्टी के प्रमुख, जो एक प्रमुख धर्मनिरपेक्ष-राष्ट्रवादी विरोधी माने जाते हैं.

यायर गोलान: वामपंथी ‘द डेमोक्रेट्स’ पार्टी के प्रमुख, जो लेबर और मेरेत्ज़ पार्टियों के बचे हुए हिस्सों का प्रतिनिधित्व करते हैं.

इज़राइल की चुनावी प्रणाली

इज़राइल में चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के तहत होते हैं. पूरा देश एक ही चुनावी क्षेत्र के रूप में काम करता है. मतदाता किसी एक व्यक्ति या प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार को वोट नहीं देते, बल्कि राजनीतिक दलों द्वारा पहले से तय की गई सूचियों को चुनते हैं.

संसद में प्रवेश पाने के लिए किसी भी पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर कम से कम 3.25% वोट (लगभग 4 सीटें) हासिल करना अनिवार्य होता है. चुनाव परिणामों के बाद, राष्ट्रपति इसाक हर्ज़ोग विभिन्न दलों के नेताओं से परामर्श करके उस उम्मीदवार को सरकार बनाने का न्योता देते हैं, जिसके पास गठबंधन बनाने की सबसे अधिक संभावना होती है.

चुनाव के मुख्य निर्णायक मुद्दे क्या हैं

-युद्ध के इस दौर में सैनिकों की भारी कमी है. ऐसे में, अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स (कट्टर धार्मिक) पुरुषों को सैन्य सेवा से मिलने वाली पारंपरिक छूट को समाप्त करने को लेकर समाज और राजनीति में भारी तनाव है.

–7 अक्टूबर की सुरक्षा विफलता बड़ा मुद्दा है. जनता सुरक्षा तंत्र की चूक पर जवाब चाहती है और एक स्वतंत्र राज्य जांच आयोग के गठन की मांग कर रही है.

– ‘राआम’ और ‘जॉइंट लिस्ट’ जैसी पार्टियों को मिलने वाली अनुमानित 13 सीटें अत्यंत महत्वपूर्ण हैं. यदि नेतन्याहू और विपक्ष दोनों ही 61 के जादुई आंकड़े तक नहीं पहुंच पाते हैं, तो ये दल ‘किंगमेकर’ की भूमिका निभाएंगे.

युद्ध और अंतरराष्ट्रीय समर्थन का प्रभाव

ईरान के साथ चल रहा तीन साल लंबा संघर्ष इस चुनाव का सबसे बड़ा मनोवैज्ञानिक कारक है. नेतन्याहू समर्थक इसे उनकी मजबूती का प्रतीक मानते हैं, जबकि विपक्षी मतदाता इसे उनकी दीर्घकालिक सुरक्षा विफलता का प्रमाण मानते हैं.

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, नेतन्याहू को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का खुला और मजबूत समर्थन प्राप्त है, जिन्होंने उन्हें एक “महान योद्धा” बताया है. इसके अलावा, भारत के साथ इजराइल के रक्षा और रणनीतिक संबंध अटूट रहे हैं, और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ नेतन्याहू के व्यक्तिगत संबंध दोनों देशों के रिश्तों को और प्रगाढ़ बनाते हैं. दूसरी ओर, अमेरिकी जनता और कई पश्चिमी अधिकारी नेतन्याहू की नीतियों से असंतुष्ट नजर आते हैं.

परिणाम और भविष्य की दिशा

ताजा जनमत सर्वेक्षणों के अनुसार, मुकाबला बेहद कांटे का है. नेतन्याहू-विरोधी गठबंधन को 51 से 55 सीटें मिलने का अनुमान है, जबकि नेतन्याहू-समर्थक गुट 48 से 51 सीटों के साथ पीछे-पीछे है.

आज मतदान समाप्त होते ही रात 10:00 बजे प्रमुख टीवी चैनलों द्वारा एग्जिट पोल जारी किए जाएंगे. बुधवार सुबह तक शुरुआती रुझान सामने आ जाएंगे, जबकि केंद्रीय चुनाव समिति 4 नवंबर, 2026 को आधिकारिक अंतिम परिणामों की घोषणा करेगी.



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