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Explained: भारत, फ्रांस और स्पेन समेत किन देशों में प्रदर्शन? चुनाव सामने और दांव पर सरकारें


सिर्फ भारत ही नहीं! अक्टूबर 2026 में दुनिया के 9 देशों में एक साथ सरकारों के खिलाफ प्रोटेस्ट चल रहे हैं. फ्रांस में एक महीने में 2,400 से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार किया, जबकि अल्बानिया में महज 6 दिनों में 295 लोग घायल हुए और 167 गिरफ्तार हुए. स्पेन में युवाओं की औसत सैलरी का 98.7% हिस्सा सिर्फ किराए पर चला जाता है, जबकि भारत में SIR के तहत 13.37 करोड़ वोटर्स के नाम कट गए. यह सिर्फ अलग-अलग खबरें नहीं हैं. यह ऐसा पैटर्न है, जिसमें महंगाई, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और रोजमर्रा की जरूरतें एक साथ कई सरकारों को घेर रही है. कई देशों में चुनाव दरवाजे पर खड़े हैं.

सवाल यह नहीं कि क्या बदलाव होगा, बल्कि सवाल है कि कौन सा बदलाव होगा और किसकी सरकार बचेगी?

भारत समेत किन-किन देशों में प्रोटेस्ट चल रहे और हालात कितने खराब?

भारत को मिलाकर कुल 9 देशों में प्रोटेस्ट की आग भड़की हुई है:

  1. अल्बानिया: 13 अक्टूबर 2026 से तिराना में हिंसक प्रदर्शन शुरू हुए. इनमें छात्रों ने यूनिवर्सिटी के बदतर हालात, बढ़ती ट्यूशन फीस और भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रधानमंत्री एडी रामा के इस्तीफे की मांग की. 6 दिनों में 295 लोग घायल हुए, जिनमें 186 पुलिसकर्मी शामिल थे. 167 लोग गिरफ्तार किए गए. रामा ने इस्तीफे से साफ इनकार कर दिया और प्रदर्शनों को ‘बाहरी ताकतों की साजिश’ बताया.
  2. फ्रांस: सितंबर में शुरू हुआ छात्र आंदोलन एक महीने में राष्ट्रव्यापी हिंसा में बदल गया. 17 अक्टूबर 2026 को पुलिस ने 1,200 से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार किया. करीब 150 पुलिसकर्मी घायल हुए. कुल मिलाकर 2,400 से ज्यादा गिरफ्तारियां दर्ज की गईं. करीब 1,500 दुकानें लुट गईं या बर्बाद हुईं. मार्सेई, लिल, एंजे और बोर्डो में प्रदर्शनकारियों ने मेयर दफ्तरों और प्रीफेक्चरों में तोड़फोड़ की. ल्योन में पर्यटन कार्यालय जला दिया और लिमोज में ऐतिहासिक सिटी हॉल आग के हवाले कर दिया.
  3. भारत: विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के खिलाफ देशभर में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं. चुनाव आयोग के मुताबिक, SIR के तीनों चरणों में 13.37 करोड़ नाम ड्राफ्ट रोल से हटाए गए. इसमें मृत, स्थानांतरित और डुप्लिकेट नाम शामिल हैं. कांग्रेस ने आरोप लगाया कि पहले दो चरणों में ही 7.8 करोड़ नाम काटे गए. प्रदर्शनकारियों की मांग है कि हर पात्र मतदाता को बहाल किया जाए और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दें.
  4. इटली: 16 अक्टूबर 2026 से ‘नो मेलोनी डे’ के तहत देशभर में छात्र प्रदर्शन शुरू हुए. इसमें शिक्षा नीतियों, बढ़ती महंगाई और सैन्य खर्च के खिलाफ नाराजगी जताई गई. मिलान में हिंसा सबसे ज्यादा हुई और 271 लोगों को हिरासत में लिया गया. 23 नाबालिग और 13 विदेशियों समेत 32 लोग गिरफ्तार हुए. 141 पुलिसकर्मी घायल हुए. मिलान, बोलोग्ना और ट्यूरिन में करीब 1 मिलियन यूरो का माली नुकसान हुआ.
  5. स्पेन: 23 सितंबर 2026 से आवास संकट के खिलाफ प्रदर्शन चल रहे हैं. मैड्रिड में 3 अक्टूबर को हुई बड़ी रैली में 9 पुलिसकर्मी घायल और 5 लोग गिरफ्तार हुए, जबकि 5 अक्टूबर तक आंकड़े बढ़कर 37 पुलिसकर्मी घायल और 21 गिरफ्तार तक पहुंच गए. स्पेनिश यूथ काउंसिल के मुताबिक, औसत मासिक किराया 1,176 यूरो है, जो एक युवा के औसत मासिक वेतन का 98.7% है. मैड्रिड और बार्सिलोना में कुछ लोग अपनी सैलरी का 70% तक सिर्फ किराये पर खर्च कर रहे हैं.
  6. पुर्तगाल: 20 अक्टूबर 2026 को पुलिस ने लिस्बन और पोर्टो में आवास-विरोधी तंबू शिविरों को सुबह-सुबह खाली किया. 55 लोग गिरफ्तार हुए और प्रदर्शनकारियों के मुताबिक करीब 30 लोग घायल हुए. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 2015 से 2024 के बीच पुर्तगाल में घरों की कीमतें 124% बढ़ीं, जो यूरोपीय यूनियन (EU) के औसत से लगभग दोगुनी है.
  7. बेल्जियम: शिक्षा में कटौती के खिलाफ प्रदर्शन हिंसक हो गए. 17 अक्टूबर को 195 लोगों को गिरफ्तार किया गया, जिनमें ब्रुसेल्स में 150 और लीज में बाकी शामिल थे. एक हफ्ते से ज्यादा चले संकट में 194 गिरफ्तारियां और 40 से ज्यादा पुलिसकर्मी घायल हुए. ब्रुसेल्स में 30 से 50 हजार लोग सड़कों पर उतरे.
  8. सर्बिया: नवंबर 2024 में नोवी साद रेलवे स्टेशन की छत गिरने की घटना के बाद से छात्रों का आंदोलन लगातार दो साल से चल रहा है. इसमें भ्रष्टाचार और सरकारी जवाबदेही पर सवाल उठाए जा रहे हैं. यह आंदोलन अब सीधे चुनावी मैदान में उतर गया है. ‘स्टूडेंट्स विन’ मूवमेंट 25 अक्टूबर 2026 के चुनाव में राष्ट्रपति वुचिच की SNS को चुनौती दे रहा है.
  9. इंडोनेशिया: जंगल की आग और जहरीली धुंध की वजह से कई हफ्तों से हजारों लोग बीमार हैं. 20 अक्टूबर 2026 को जकार्ता, बांडुंग और योग्यकार्ता में छात्रों ने सरकार की ‘नाकामी और भ्रष्टाचार’ के खिलाफ प्रदर्शन किया. पुलिस ने 6 कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया. यह प्रदर्शन प्रबोवो सरकार के दूसरे सालगिरह पर हुए, जहां महंगाई, बेरोजगारी और पर्यावरणीय तबाही के खिलाफ गुस्सा फूटा.

इन देशों की सीमाएं कैसे जुड़ती हैं?

इन 9 देशों में से 6 यूरोपीय देशों की सीमाएं एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं. फ्रांस, इटली, स्पेन, पुर्तगाल, बेल्जियम और सर्बिया में से पांच शेंगेन क्षेत्र का हिस्सा हैं. यहां बिना पासपोर्ट जांच के आवागमन होता है. इस वजह से एक देश में उठा प्रदर्शन दूसरे देशों में भी फैल रहा है.

फ्रांस का छात्र आंदोलन बेल्जियम और इटली तक पहुंचा. स्पेन और पुर्तगाल का आवास संकट एक ही लहर का हिस्सा बन गया. यूरोपीय मीडिया ने इसे ‘सड़कों का विद्रोह’ और ‘नाराजगी का भूगोल’ कहा है, जो राष्ट्रीय सीमाओं को पार कर रहा है.

अल्बानिया और सर्बिया बाल्कन में हैं, जहां सीमाएं जुड़ी हुई हैं और दोनों के आंदोलनों को एक ही सामाजिक लहर का हिस्सा माना जा रहा है. भारत और इंडोनेशिया का इनसे सीधा सीमाई संबंध नहीं है, लेकिन दोनों में चल रहे प्रदर्शन युवाओं के नेतृत्व वाली वैश्विक असहमति का हिस्सा हैं.

इन प्रदर्शनों में मुसलमान क्यों हैं निशाने पर?

इसका जवाब हर देश में अलग है, लेकिन डेटा एक साफ पैटर्न दिखाता है…

भारत में SIR के तहत मुस्लिम मतदाताओं को व्यवस्थित रूप से निशाना बनाए जाने के ठोस सबूत सामने आए हैं. उत्तराखंड में BJP से जुड़े पांच लोगों ने 6,500 वोटर डिलीशन की अर्जियां दायर कीं. इनमें सभी निशाने पर मुस्लिम मतदाता थे. उत्तर प्रदेश में पाया गया कि 90% डिलीशन रिक्वेस्ट मुस्लिम वोटरों के खिलाफ थीं. पश्चिम बंगाल में अपील खारिज होने वालों में 80.2% मुस्लिम नाम थे. कर्नाटक में भी फॉर्म 7 के जरिए बड़े पैमाने पर मुस्लिम वोटरों के नाम हटाने की कोशिशें सामने आईं.

यूरोप में इस्लामोफोबिया के आंकड़े चौंकाने वाले हैं. जर्मनी में 2025 में 4,096 मुस्लिम-विरोधी घटनाएं दर्ज की गईं, जो 2024 से 33% ज्यादा हैं. यानी औसतन रोज 11 से ज्यादा घटनाएं हुईं. फ्रांस में 2025 में मुस्लिम-विरोधी घटनाओं में 88% की बढ़ोतरी हुई. यूरोप भर में 2025 में 876 मुस्लिम-विरोधी मामले दर्ज किए गए. ये आंकड़े बताते हैं कि यूरोप में मुसलमानों को निशाना बनाना कोई अलग-थलग घटना नहीं, बल्कि एक बढ़ती हुई प्रवृत्ति है.

यह समझना भी जरूरी है कि ये प्रदर्शन मुख्य रूप से आर्थिक असंतोष, भ्रष्टाचार और सरकारी नीतियों के खिलाफ हैं. मुसलमानों का निशाना बनना एक समानांतर समस्या है. इसका मूल कारण आर्थिक और राजनीतिक है, सिर्फ धार्मिक नहीं.


Explained: भारत, फ्रांस और स्पेन समेत किन देशों में प्रदर्शन? चुनाव सामने और दांव पर सरकारें

सिर्फ प्रदर्शन नहीं, चुनावी भूचाल की तैयारी

इन 9 देशों में सड़कों पर उठा गुस्सा सिर्फ महंगाई या एक-दो नीतियों तक सीमित नहीं है. यह उस पुराने राजनीतिक ढांचे के खिलाफ है, जिसने युवाओं को आवास, नौकरी, बेहतर शिक्षा और भरोसेमंद चुनावी प्रक्रिया का भरोसा नहीं दिया.  यह गुस्सा सड़क से वोटिंग बूथ तक पहुंचने वाला है.



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