नॉर्वेजियन नोबेल कमेटी द्वारा इस साल के शांति पुरस्कार विजेता की आधिकारिक घोषणा किए जाने से कुछ ही दिन पहले, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर इस प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय सम्मान के लिए अपनी दावेदारी पूरी मजबूती से पेश कर दी है. हालांकि, उनके इस दावे के साथ ही वैश्विक कूटनीतिक और राजनीतिक गलियारों में एक बेहद अहम और गंभीर सवाल तैरने लगा है कि क्या कोई ऐसा राष्ट्राध्यक्ष, जिसका देश खुद किसी सक्रिय युद्ध या सैन्य टकराव में सीधी भूमिका निभा रहा हो, वास्तव में नोबेल शांति पुरस्कार जीतने का हकदार हो सकता है?
हाल ही में पत्रकारों से बातचीत करते हुए राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा, “मुझे सच में नहीं पता कि नोबेल कमेटी का अंतिम फ़ैसला क्या होने वाला है.” इसके साथ ही उन्होंने तंज कसते हुए यह भी जोड़ा कि इस वैश्विक समिति की ऐतिहासिक छवि कुछ ऐसी रही है कि वह शायद उनके जैसे स्पष्टवादी और लीक से हटकर काम करने वाले नेताओं को यह सर्वोच्च सम्मान देने में हिचकिचाती है.
‘आठ युद्ध सुलझाने’ का दावा और कमेटी पर दबाव
जनवरी 2025 में दोबारा व्हाइट हाउस की कमान संभालने के बाद से, डोनाल्ड ट्रंप लगातार यह दोहराते रहे हैं कि उनके नए प्रशासन ने दुनिया के कई जटिल और वर्षों पुराने अंतरराष्ट्रीय संघर्षों को सुलझाने या उनके तनाव को कम करने में निर्णायक भूमिका निभाई है. हालिया बयानों में उन्होंने सार्वजनिक रूप से यह बड़ा दावा किया कि उन्होंने अपने कार्यकाल में “आठ बड़े युद्धों को सुलझाया या रुकवाया है.”
ट्रंप का मानना है कि यदि उनके इन वैश्विक कूटनीतिक प्रयासों को नोबेल कमेटी द्वारा आधिकारिक रूप से मान्यता नहीं दी जाती है, तो यह स्वयं नोबेल शांति पुरस्कार की निष्पक्षता और उसकी वैश्विक विश्वसनीयता पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा कर देगा.
हालांकि, ट्रंप के इन लुभावने दावों के बीच एक ऐसी ठोस और कड़वी जमीनी हकीकत भी है जिसे नजरअंदाज करना नामुमकिन है. अमेरिका वर्तमान में भी ईरान के साथ एक बेहद संवेदनशील और बड़े सैन्य टकराव में सीधे तौर पर उलझा हुआ है. ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि क्या युद्ध के इस साये में ट्रंप की दावेदारी व्यावहारिक रूप से मजबूत रह जाती है?
क्या युद्ध में शामिल होना अयोग्यता का आधार है?
यदि नोबेल शांति पुरस्कार के आधिकारिक संविधान और कानूनी नियमों का विश्लेषण किया जाए, तो उसमें ऐसा कोई भी प्रत्यक्ष नियम या प्रावधान मौजूद नहीं है जो किसी युद्ध में शामिल देश के राजनीतिक नेता, प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति को नोबेल शांति पुरस्कार पाने से स्वतः रोक देता हो.
यह प्रतिष्ठित पुरस्कार मुख्य रूप से इसके संस्थापक अल्फ्रेड नोबेल की ऐतिहासिक वसीयत में तय किए गए व्यापक और उदार मानदंडों के आधार पर प्रदान किया जाता है. अल्फ्रेड नोबेल के दिशानिर्देशों के अनुसार, यह सम्मान उस विशिष्ट व्यक्ति या संस्था को दिया जाना चाहिए जिसने बीते वर्ष में “मानव जातियों के बीच बंधुत्व को बढ़ावा देने, सेनाओं को कम करने या हटाने और शांति सम्मेलनों का आयोजन एवं प्रसार करने में सबसे बड़ा या सबसे बेहतर काम किया हो.”
नॉर्वेजियन नोबेल समिति मुख्य रूप से शांतिपूर्ण वार्ताओं को बढ़ावा देने, अंतरराष्ट्रीय विवादों को सुलझाने, मानवाधिकारों की रक्षा करने और वैश्विक सहयोग को मजबूत करने के आधार पर उम्मीदवारों का मूल्यांकन करती है.
इसका सीधा और तकनीकी मतलब यह है कि नोबेल समिति केवल इस बात के आधार पर किसी उम्मीदवार को खारिज नहीं करती कि उसका देश किसी सैन्य कार्रवाई या सीमांत संघर्ष में शामिल है या नहीं. इसके बजाय, समिति उस विशिष्ट उम्मीदवार के व्यक्तिगत और प्रत्यक्ष योगदान का निष्पक्ष आकलन करती है. यही वह बिंदु है जहां डोनाल्ड ट्रंप की दावेदारी सबसे अधिक विवादित और बहस का केंद्र बन जाती है.
कूटनीतिक दावे, क्षेत्रीय विवाद और अधूरी वादे
राष्ट्रपति ट्रंप ने दुनिया के कई प्रमुख संघर्षों में अपनी मध्यस्थता और कूटनीतिक प्रयासों का श्रेय बार-बार खुद लिया है. इनमें मुख्य रूप से इज़राइल और ईरान के बीच बढ़ता तनाव, भारत और पाकिस्तान के बीच का सीमा विवाद, आर्मेनिया और अज़रबैजान का क्षेत्रीय संघर्ष, तथा कंबोडिया और थाईलैंड के बीच की कूटनीतिक तनातनी शामिल हैं.
कंबोडिया, इज़राइल और पाकिस्तान जैसे देशों के कुछ शीर्ष नेताओं ने सार्वजनिक मंचों पर यह बयान दिया था कि उन्होंने डोनाल्ड ट्रंप का नाम नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकित (Nominate) किया है. हालाँकि, इन नामांकनों की किसी भी स्वतंत्र या आधिकारिक स्रोत से पुष्टि नहीं की जा सकती, क्योंकि नोबेल समिति के सख्त नियमों के अनुसार सभी नामांकनों की सूची को 50 वर्षों तक पूरी तरह गुप्त और गोपनीय रखा जाता है.
दूसरी तरफ, ट्रंप द्वारा किए गए कूटनीतिक सफलताओं के दावों को कई संबंधित पक्षों और अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों ने खारिज भी किया है. आलोचकों का तर्क है कि ट्रंप जिन इलाकों में शांति स्थापित करने का दावा करते हैं, उनमें से कई क्षेत्रों में हिंसक संघर्ष दोबारा भड़क उठे हैं.
इसके अलावा, यूक्रेन में जारी रूस के भयानक युद्ध को 24 घंटे के भीतर खत्म कराने का उनका बहुचर्चित चुनावी वादा भी अब तक अधूरा ही साबित हुआ है. वहीं, मध्य पूर्व में ईरान के साथ अमेरिका और इज़राइल की जारी सैन्य तनातनी ने पूरे क्षेत्र को अस्थिरता के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है.
नोबेल मेडल का अजूबा किस्सा
इस पूरे घटनाक्रम में एक बेहद दिलचस्प और अनोखा मोड़ तब आया जब एक अभूतपूर्व घटना ने ट्रंप के ‘नोबेल अभियान’ को मीडिया की सुर्खियों में ला दिया. वेनेजुएला की प्रमुख विपक्षी नेता मारिया कोरिना मचाडो जिन्होंने 2025 का नोबेल शांति पुरस्कार जीता था, ने व्हाइट हाउस की अपनी आधिकारिक यात्रा के दौरान राष्ट्रपति ट्रंप से मुलाकात की.
इस ऐतिहासिक मुलाकात के दौरान मचाडो ने अपना असली नोबेल शांति पुरस्कार मेडल राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को भेंट कर दिया. मचाडो ने इस पुरस्कार को ट्रंप और वेनेजुएला के लोकतंत्र-प्रेमी आवाम को समर्पित करते हुए कहा कि वेनेजुएला में तानाशाही के खिलाफ लड़ाई और लोकतंत्र की पुनर्स्थापना में ट्रंप की भूमिका ऐतिहासिक रही है.
राष्ट्रपति ट्रंप ने इस अभूतपूर्व कदम का स्वागत करते हुए इसे “पारस्परिक सम्मान और गहरा आभार व्यक्त करने वाला एक शानदार और ऐतिहासिक भाव करार दिया.
क्या नोबेल पुरस्कार ट्रांसफर किया जा सकता है?
हालांकि, इस भावुक क्षण के तुरंत बाद नोबेल इंस्टीट्यूट को आधिकारिक रूप से सामने आकर स्थिति स्पष्ट करनी पड़ी. संस्था ने अपने कड़े नियमों का हवाला देते हुए साफ शब्दों में कहा कि एक बार नोबेल शांति पुरस्कार किसी व्यक्ति या संस्था को प्रदान कर दिए जाने के बाद, उसे कानूनी रूप से किसी अन्य व्यक्ति को स्थानांतरित, साझा या वापस नहीं लिया जा सकता.
कोरिना मचाडो का मेडल भले ही भौतिक रूप से ट्रंप के पास हो, लेकिन आधिकारिक नोबेल रिकॉर्ड में डोनाल्ड ट्रंप को नोबेल शांति पुरस्कार विजेता नहीं माना जा सकता.
इसके बावजूद, राष्ट्रपति ट्रंप अपनी जनसभाओं और बयानों में इस घटना का उल्लेख अपनी दावेदारी को मजबूत करने के लिए करते रहते हैं. उनका कहना है कि भले ही यह सम्मान उन्हें अप्रत्यक्ष रूप से मिला हो, लेकिन एक वास्तविक नोबेल विजेता से ऐसा सम्मान पाना उनके लिए अत्यंत गर्व की बात है. ट्रंप के अनुसार, “यह इस बात का जीवंत प्रमाण है कि दुनिया के निष्पक्ष लोग मानते हैं कि इतिहास में राष्ट्रपति ट्रंप से ज़्यादा इस पुरस्कार का सच्चा हक़दार और कोई नहीं रहा है.”














